हठबंधन या गठबंधन ? चाचा शिवपाल को भतीजे अखिलेश के जवाब का इंतज़ार

यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन को लेकर कहा है कि वो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं।


सामाजिक परिवर्तन रथयात्रा लेकर बरेली पहुंचे शिवपाल यादव ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता की चाबी प्रसपा की जेब में है और उनके बगैर कोई पार्टी सरकार नहीं बना पाएगी।


शिवपाल यादव ने कहा कि वो अखिलेश यादव के जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं लेकिन उनके सभी विकल्प खुले हैं।
शिवपाल यादव कई मौकों पर सपा के साथ गठबंधन करने का प्रस्ताव दे चुके हैं। शिवपाल ने कहा कि उन्होने 40 साल सपा के लिये काम किया है। इसलिए वो अखिलेश के राजनीतिक फैसले का इंतज़ार कर रहे हैं।


शिवपाल सिंह यादव ने योगी सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि राज्य सरकार हर मोर्चे पर विफल रही है और सरकार के सभी दावे और वादे झूठे साबित हुए हैं। सरकार ने सिर्फ चंद पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने का काम किया है।

क्यों ज़रूरी है सपा-प्रसपा गठबंधन ? क्या है प्रसपा की राजनीतिक हैसियत ?
प्रसपा ने 2019 लोकसभा चुनाव में पहली बार अपना राजनीतिक जनाधार साबित किया। शिवपाल यादव ने इटावा, बरेली और कानपुर देहात में उम्मीदवार उतारे और खुद भतीजे अक्षय यादव के खिलाफ चुनाव लड़कर उन्हें बीजेपी के हाथों हरवा दिया। उनकी वजह से सपा वोट बैंक का बंटवारा हुआ और इन सभी सीटों पर सपा की हार हुई।


शिवपाल यादव ने ये साबित किया कि वो खुद जीत सकें या न जीत सकें लेकिन समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव का खेल बिगाड़ने में सक्षम है।


त्रीस्तरीय पंचायत चुनाव में प्रसपा ने जमीन पर अपनी पकड़ साबित की। इटावा में सपा-प्रसपा के गठबंधन ने बीजेपी को हराकर एक उदाहरण पेश किया है कि अगर सपा का कुनबा एक हो जाए तो वो बीजेपी को टक्कर देने में सक्षम हैं।

गठबंधन किसकी मजबूरी है ? शिवपाल की या अखिलेश की ?
अब अहम सवाल ये है कि गठबंधन की ज़रूरत किसे ज्यादा है ? असल में शिवपाल यादव पार्टी बनाकर लोकसभा चुनाव में हार का स्वाद चख चुके हैं। उन्हें राजनीतिक ऑक्सीजन की ज़रूरत है। ऐसे लगता है कि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा यादव परिवार की राजनीतिक सत्ता में से सिर्फ अपना हिस्सा हासिल करने तक सीमित हो गई है। जिस तरह से वो बार बार अखिलेश यादव से गठबंधन करने की बात कह रहे हैं, उससे लगता है कि वो सिर्फ राजनीतिक तौर पर प्रासंगिक बने रहना चाहते हैं।

क्यों पत्ते नहीं खोल रहे अखिलेश यादव ?
दूसरी तरफ अखिलेश यादव प्रसपा से गठबंधन पर अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं। अखिलेश कांग्रेस और बसपा से गठबंधन कर नुकसान झेल चुके हैं। ऐसे में दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पी रहा है। वो बिना राजनीतिक हैसियत आंके किसी के साथ सीटों का बंटवारा नहीं करना चाहते हैं।


साथ ही अखिलेश समाजवादी पार्टी या सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर कोई समझौता नहीं करना चाहते हैं। वो पार्टी पर एकाधिकार रखना चाहते हैं। वो अगर शिवपाल यादव के साथ कोई राजनीति समझौता करेंगे तो उसे बहुत सीमित रखना चाहते हैं। उनकी नज़र समाजवादी पार्टी के भटके हुए परंपरागत वोट को वापस लाने और अपने नेतृत्व पर यकीन दिलाने की है।

कब तक तस्वीर होगी साफ ?
ऐसे में सपा-प्रसपा और अखिलेश-शिवपाल में रस्साकशी जारी है। इन दोनों में गठबंधन होगा या नहीं होगा, इस बात का खुलासा मुलायम सिंह के जन्मदिन 22 नवबंर तक हो सकता है। इसी दिन दोनों क्षत्रप एक मंच पर दिख सकते हैं। तब तक इंतज़ार करना होगा अखिलेश चाचा शिवपाल का आशिर्वाद लेते हैं या नहीं और शिवपाल भतीजे अखिलेश को गले लगाते हैं या नहीं ?

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